चाटुकारिता के इस दौर में जहां जर्नलिज्म से ज़्यादा जिंगोइस्म को बढ़ावा दिया जा रहा है वहां हमारी एक छोटी सी कोशिश हाशिए पर पड़े लोगों की आवाज़ को आगे लाने की है.